
0. खोखले साबित हुए सरपंच-सचिव के वादे
0.चंदा और श्रमदान: ग्रामीणों ने खुद मंगवाई मशीनें
फरसाबहार: विकासखंड फरसाबहार के ग्राम कोरंगामाल के आश्रित ग्राम भालूमुण्डा (यादवपारा एवं खड़िया टोली) में पंचायत प्रतिनिधियों की घोर लापरवाही और उदासीनता का एक बड़ा मामला सामने आया है। बदहाल सड़क से परेशान होकर जब ग्रामीणों के सब्र का बांध टूट गया, तो उन्होंने सिस्टम के भरोसे बैठने के बजाय खुद ही सड़क सुधारने का बीड़ा उठा लिया।

सुत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक भालूमुण्डा के यादवपारा और खड़िया टोली मार्ग की हालत लंबे समय से जर्जर थी। इस खराब रास्ते की वजह से स्कूली बच्चों को स्कूल जाने में और आम राहगीरों को रोजाना आवाजाही में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। ग्रामीणों के मुताबिक, उन्होंने इस समस्या को लेकर सरपंच गजेंद्र कालो और सचिव निरेन्द्र साव से कई बार शिकायत की थी। ग्राम सभा की बैठकों में भी सड़क निर्माण का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया था। सरपंच ने बस्ती का दौरा कर सड़क बनवाने का आश्वासन भी दिया था, लेकिन धरातल पर कोई काम नहीं हुआ और उनका यह वादा पूरी तरह से खोखला साबित हुआ। लगातार मिल रही उपेक्षा से त्रस्त ग्रामीणों ने आखिरकार अपने दम पर रास्ता बनाने का फैसला किया। ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से जेसीबी और ट्रैक्टर किराए पर मंगाए और सड़क का चौड़ीकरण व मरम्मत का काम शुरू कर दिया।जेसीबी मशीन और ट्रैक्टरों की मदद से कच्ची सड़क पर मिट्टी और मुरुम डालकर उसे समतल किया जा रहा है। इस दौरान ग्रामीण खुद मौके पर खड़े होकर काम करवा रहे हैं और मिट्टी के ऊंचे ढेलों को बराबर करने में अपना श्रमदान भी दे रहे हैं।

0. सराहनीय भूमिका और पंचायत की बेरुखी
इस पूरे अभियान में गांव के लिंगराज यादव, नवीन मांझी, गुलाब यादव, ललित यादव और करन मांझी सहित अन्य ग्रामीणों ने बेहद सक्रिय और सराहनीय भूमिका निभाई। ग्रामीणों का कहना है कि जब जिम्मेदारों ने बार-बार शिकायत के बाद भी आंखें मूंद लीं, तो उन्हें मजबूरी में यह कदम उठाना पड़ा। सबसे हैरानी की बात यह रही कि जब ग्रामीण खुद के खर्चे और मेहनत से सड़क का मुरुमीकरण करवा रहे थे, तब इसकी जानकारी पंचायत सचिव को भी लग गई थी। इसके बावजूद सचिव ने मौके पर आकर मुआयना करने या ग्रामीणों की सुध लेने की जहमत तक नहीं उठाई।यह घटना स्थानीय पंचायत के कामकाज और विकास दावों की पोल खोलती है। ग्रामीणों की यह पहल जहां उनकी एकजुटता की मिसाल है, वहीं यह उन जनप्रतिनिधियों के लिए एक कड़ा सबक भी है जो चुनाव जीतने के बाद जनता की बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज कर देते हैं।













