*वन विभाग के निर्माण कार्यों को ठेका पद्धति से कराने का वन कर्मचारी संघ ने किया विरोध*
जशपुर। वन विभाग में सिविल निर्माण एवं अन्य मैदानी विभागीय कार्यों को ठेका पद्धति से कराए जाने तथा मैदानी कर्मचारियों के अधिकारों एवं दायित्वों को सीमित किए जाने के प्रस्ताव के विरोध में छत्तीसगढ़ वन कर्मचारी संघ, जिला शाखा जशपुर ने वनमण्डलाधिकारी को विरोध-पत्र सौंपा है।
संघ का मानना है कि वन क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां, स्थानीय आवश्यकताएं और वन संरक्षण की संवेदनशीलता सामान्य निर्माण कार्यों से अलग होती हैं। ऐसे कार्यों में मैदानी वन अमले की प्रत्यक्ष निगरानी एवं स्थानीय ग्रामीणों की सहभागिता महत्वपूर्ण है। संघ ने विभागीय कार्यों को अनावश्यक रूप से ठेका पद्धति पर निर्भर करने पर गंभीर चिंता जताई है।
विरोध-पत्र में संघ ने कहा कि ठेका व्यवस्था से ठेकेदार का लाभांश, निविदा प्रक्रिया, निगरानी एवं अन्य प्रशासनिक व्यय बढ़ने की संभावना है। वहीं स्थानीय श्रमिकों और वनाश्रित परिवारों को मिलने वाला रोजगार भी प्रभावित हो सकता है। संघ ने यह भी आशंका जताई कि ठेकेदारों के कार्यों की निगरानी में मैदानी कर्मचारियों का अतिरिक्त समय लगने से वन सुरक्षा, अवैध कटाई की रोकथाम, वन्यजीव संरक्षण एवं अग्नि नियंत्रण जैसे मूल दायित्व प्रभावित हो सकते हैं।
संघ ने जल संरक्षण एवं मृदा संरक्षण से जुड़े कार्यों, वृक्षारोपण, कूप कटाई, वन सुरक्षा तथा अन्य मैदानी कार्यों में विभागीय अमले, स्थानीय ग्रामीणों एवं वन सुरक्षा समितियों की सहभागिता को प्राथमिकता देने की मांग की है।
इसके साथ ही संघ ने ठेकेदारों के कार्यों पर प्रभावी विभागीय नियंत्रण, गुणवत्ता की निगरानी, शासकीय राशि के पारदर्शी एवं मितव्ययी उपयोग तथा मैदानी कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है।
संघ की प्रमुख मांगों में ठेका पद्धति से संबंधित प्रस्तावित व्यवस्था पर पुनर्विचार, मैदानी कर्मचारियों की अधिकारिता एवं भूमिका पूर्ववत बनाए रखना, स्थानीय ग्रामीणों को अधिकाधिक रोजगार उपलब्ध कराना तथा किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पूर्व संघ के प्रतिनिधियों से चर्चा करना शामिल है।
*बातचीत में नंदकुमार यादव जिलाध्यक्ष वन कर्मचारी संघ जशपुर ने कहा* -कि वन संरक्षण, विभागीय कार्यों की गुणवत्ता, शासकीय धन के सदुपयोग, स्थानीय ग्रामीणों के रोजगार और मैदानी कर्मचारियों के मनोबल को ध्यान में रखते हुए इस व्यवस्था पर गंभीरता से पुनर्विचार किया जाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि समय रहते सकारात्मक निर्णय नहीं होने पर संघ अपने संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत आगामी आंदोलनात्मक कार्यक्रमों पर निर्णय लेने के लिए बाध्य होगा।













